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साधु के लक्षण | Sadhu Ke Lakshan |

भारत वर्ष की साधुता विश्व-विख्यात है। यहां साधु-सन्तों का सदा से बाहुल्य रहा है। साधु सज्जन को कहते हैं। जिसमें निष्कलंक सज्जनता है, उसे साधु ही कहा जायगा।

गरुण पुराणमें साधुओं के लक्षण बतलाते हुए कहा गया है

‘‘जो अपमान से क्रुद्ध और सम्मान से हर्षित नहीं होते, यदि किसी पर रोष करते भी हैं तो गलत वचन मुंह से नहीं निकालते, वे ही साधु हैं। सदा भौतिक सुखों और भोगेच्छा से विरत होते हैं और सब प्राणियों के हित के लिए चेष्टा करते रहते हैं। ये पराये दुःख से दुखी होते हैं और दूसरे के दुःख को देखकर अपना सुख भूल जाते हैं। वृक्ष जैसे स्वयं दारुण ताप को सहता हुआ भी दूसरे को कष्टदायक धूप से बचाता है, उसी प्रकार साधु भी दूसरों के हितार्थ स्वयं कष्ट सहन करते हैं।’’

एक बार किसी श्रद्धालु ने कबीर से पूछा, ‘साधु के लक्षण क्या होते हैं?’ उन्होंने तपाक से कहा,

साधु सोई जानिए, चले साधु की चाल। परमारथ राता रहै, बोलै वचन रसाल।


यानी संत उसी को जानो, जिसके आचरण संत की तरह शुद्ध हैं। जो परोपकार-परमार्थ में लगा हो और सबसे मीठे वचन बोलता हो।

कबीरदास ने अपनी साखी में लिखा, ‘संत उन्हीं को जानो, जिन्होंने आशा, मोह, माया, मान, हर्ष, शोक और परनिंदा का त्याग कर दिया हो। सच्चे संतजन अपने मान-अपमान पर ध्यान नहीं देते। दूसरे से प्रेम करते हैं और उसका आदर भी करते हैं।उनका मानना था कि यदि साधु एक जगह ही रहने लगेगा, तो वह मोह-माया से नहीं बच सकता। इसलिए उन्होंने लिखा, बहता पानी निरमला- बंदा गंदा होय। साधुजन रमता भला- दाग लागै कोय। संत कबीरदास जानते थे कि ऐसा समय आएगा, जब सच्चे संतों की बात मानकर लोग दुर्व्यसनियों की पूजा करेंगे। इसलिए उन्होंने लिखा था, यह कलियुग आयो अबै, साधु मानै कोय। कामी, क्रोधी, मसखरा, तिनकी पूजा होय। आज कबीर की वाणी सच्ची साबित हो रही है तथा संत वेशधारी अनेक बाबा घृणित आरोपों में घिरे हैं।

 

महात्मा पुरुषों के चरित्र विचित्र हैं ये लक्ष्मी को तृण समान समझते हैं यदि लक्ष्मी इन महापुरुषों को प्राप्त हो जाती है तो उसके बोझ से दब जाते हैं अर्थात् नम्र हो जाते हैं।

साधु पुरुष किसी के दोष को मुख पर नहीं लाते मन में ही धारण कर लेते हैं जैसे शिवजी ने विष को पचा लिया।

साधु पुरुष दुर्जनों के संग होने पर भी विकार को प्राप्त नहीं होते जैसे सर्पों के लिपटे रहने पर भी चन्दन में विष नहीं आता |

किसी के क्रोध कराने पर भी साधु पुरुष के मन में विकार नहीं होता जैसे तिनका की अग्नि से समुद्र का जल गरम नहीं होता।

सन्त पुरुष अपने गुण से प्रकाशित होते हैं औरों के कहने से नहीं। कस्तूरी की सुगंध स्वतः प्रकाशित होती है सौगन्ध से नहीं।

यदि सन्त पुरुष दूसरों पर कृपा करते हैं तो इसमें अचंभा किस बात का? क्या चन्दन का वृक्ष अपने शरीर की शीतलता के लिये होता है? नहीं, वह औरों को शीतल करता है।

साधु पुरुषों के जो बात मन में होती है उसी को वाणी से कहते हैं और करते भी वही हैं। मन, वाणी और शरीर का एक सा ही व्यवहार साधुओं का होता है।

साधु पुरुष निर्गुण पुरुष पर भी दया करते हैं। क्या चन्द्रमा चाँडाल के मकान में चाँदनी प्रकाशित नहीं करता?

भलाई करने पर यदि भलाई की तो उसके साधुपन का क्या गुण हुआ? अपकार (बुराई) करने पर यदि भलाई करे उसको सज्जन साधु कहते हैं।

दुर्जनों के संसर्ग से सज्जन पुरुष अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते। कोयल कौआ के संसर्ग से अपनी मीठी बोली को नहीं छोड़ती।

 

वसुधैव कुटुम्बकम् की उदारता एवं महानता जिस किसी अन्तःकरण में उदय हो रही होगी, वह अपनी आन्तरिक महानता के कारण इस धरती का देवता माना जायगा, इसे साधु-महात्मा कहकर पूजा जायगा। साधु ज्ञान का अग्रदूत है, उसने भगवा वस्त्र ज्ञान रूपी सूर्य का प्रकाश फैलाने के लिए ही धारण किये हैं। वह अरुणोदय का प्रतिनिधि है। उसकी साधना विश्व में ज्ञान की अभिवृद्धि के लिए ही होनी चाहिए। इसी में साधुता की सार्थकता है।

संत पुरुष यदि तुमको कुछ उपदेश दे तो भी उनकी सेवा करो क्योंकि उनकी नित्य प्रति की बोलचाल व्यवहार है वही तुम्हारे लिए शास्त्र है-शिक्षा दायक है।



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