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किनसे हमारी आत्मा पतित होकर दुःख की पाती है? | Vedon ka Divya Gyan | Atambal - 003 |


भावार्थ:

पुत्रैषणा, वित्तैषणा तथा लोकैषणा की भावना से हम उन्मुक्त हों क्युकि इनसे हमारी आत्मा पतित होकर दुःख की पाती है |

सन्देश:

संसार के सभी प्राणी सुख चाहते हैं और सदा यही प्रयत्न करते रहते है कि उनके सुखों में दिनों दिन व्रद्धि होती जाये | भौतिकवादी संस्कृति में भांति-भांति के सुविधा साधनों को एकत्र कर लेना ही सुख का आधार माना जाता है | नीति-अनीति, उचित-अनुचित किसी भी तरह से हो संसार के सभी भोग्य पदार्थों को मनुष्य स्वयं ही हड़प लेना चाहता है | इस प्रकार विवेकहीनता से भोग विलास में निमग्न रहकर मनुष्य खोखला हो जाता है और सुख भोगने की क्षमता ही गँवा बैठता है | सुख के अतिक्रमण में भी दुःख है |

 

भारत की आध्यात्मिक संस्कृति सुख से भी आगे संतोष एवं आनंद को महत्व देती है | सुख और संतोष आध्यात्मिक | सुख भोगपरक है तो संतोष अनुभूति परक | मनुष्य सदैव आत्म संतोष और आनंद प्राप्ति की कामना करता है | कभी-कभी उसे संतोष सुख की प्राप्ति से होता है और कभी सुख के त्याग से | किसी रोगी की सेवा में रात-दिन एक कर देने में कितना कष्ट क्यों न हो पर जिस आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है उसका बखान नहीं हो सकता है | वस्तुतः सुख, साधनों पर उतना निर्भर नहीं करता कि मनः स्थिति पर | तभी तो हम देखते  है कि साधन संपन्न व्यक्ति अधिकतर दुखी रहते हैं जबकि अभावग्रस्त किसान मजदूर सदैव सुखी, प्रसन्न और प्रफुल्लित |

 

आज चारों और अधिकतर व्यक्ति इसी मायाजाल में फंसे हैं और सुख प्राप्ति के उलटे मार्ग पर चल रहे हैं | मनुष्य जब अपने सुख की चिंता में रहता है, तब वह दूसरों की परवाह नहीं करता और स्वार्थी बन जाता है तथा दूसरों को दुःख ही पहुंचने लगता है | संसार में भोग्य वस्तुएं सीमित है और इच्छाएं अनंत | परंतु स्वार्थवाद के चलते थोड़े से वयक्ति ही लाभान्वित होते हैं और बहुसंख्यक का शोषण होता है ऐसा आचरण करने वाले अनैतिक, अवसरवादी और समाज के शोषक माने जाते हैं | पुत्रैषणा, वित्तैषणा तथा लोकैषणा की भावना से वह संसार में लूट खसोट तो खूब करते है, बाह्य दृष्टि से बड़े सुखी भी दिखाई देते हैं परन्तु सुख के समस्त साधनों के रहते हुए भी वे सुख का आस्वादन नहीं कर पाते | उनके पुत्र व परिवारी भी कुमार्गी होकर दुःख पाते हैं और अंततः चारों और से उन्हें अपयश ही मिलता है |

 

आदर्श समाज वही होता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा व क्षमता के द्वारा सुख-साधनों को बढ़ाने की पूर्ण स्वतंत्रता हो | साथ ही वह दूसरों की स्वतंत्रता में भी किसी प्रकार से बाधक न हो, वरन उनका सहयोग ही करे | यदि वयक्ति इस तथ्य को समझकर लोभ, मोह व स्वार्थ से छुटकारा पा ले तो उसका जीवन क्या से क्या हो जाए |

 

इसके लिए मनुष्य की आत्मशक्ति ही उसे प्रेरित कर सकती है | जो जितना अधिक आत्मबल का धनी होगा वह उतना ही जल्दी इन माया मोह के बंधनों को काट फेंकने में स्वार्थ होगा |


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