Summary:
एकाग्रता बहुमूल्य गुण है | एकाग्रता एक ऐसी शक्ति है जो वेक्ति को किसी भी क्षेत्र में सफलता को सुनिश्चित करती है | अपने लक्ष्य की ओर से ध्यान को न भटकने देना ही एकाग्रता कहलाती है |
"मित्रो! पौराणिक काल से ही एकाग्रता के महत्व पर बल दिया जाता रहा हैं. जब कौरव और पांडव गुरुकुल में पढ़ते थे तो उनके गुरु भी उन्हें एकाग्रता का पाठ प्थाते थे. आँख पर एकाग्रता केन्द्रित करने के कारण अर्जुन ने उस पर सही निशाना लगाया और यही कारण था कि वे महान धनुर्धर बन पाए |
स्वामी विवेकानंद जी ने एकाग्रता के बारे में कहा है कि “मस्तिष्क की शक्तियां सूर्य की किरणों के समान हैं, जब वह केंद्रित हो जाती है तो चमक उठती हैं।”
"मित्रो! एकाग्रता के चमत्कार, एकाग्रता की शक्ति के बारे में भला मैं आपको क्या बताऊँ! ध्यान की एकाग्रता जिसमें आ जाती है, वह फर्स्ट डिवीजन में पास हो जाता है। यह ध्यान की एकाग्रता है।
प्रत्येक उद्देश्य की पूर्ति के लिये जो उपक्रम किये जाते हैं, सफलता के लिये उनमें एकाग्रता बहुत जरूरी है।
जीवन का एक व्यवसाय निश्चित कर लें फिर उसमें तत्परता पूर्वक सारी शक्ति लगा दें। पूर्ण एकाग्रता के बिना सफलता नहीं मिलती।
किसी व्यक्ति की बहुत बड़ी सफलता देखकर या किसी महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर लोग बहुत बड़े संकल्प कर लेते हैं। पर कुछ ही दिनों में उन्हें असफल हुआ पाते हैं |
युद्ध में लड़ने का काम सैनिक करते हैं। किन्तु विजय का श्रेय कमाण्डर को मिलता है। वही यह निश्चित करता है कि किस टुकड़ी को कहाँ लगायें, कहाँ गोला, बारूद पहुँचे, कहाँ की संचार व्यवस्था कैसी हो? पूर्ण एकाग्रता से उस पर विश्लेषण करता रहता है तब कहीं विजय का श्रेय उसे मिल पाता है। एकाग्रता, लक्ष्य बुद्धि और तन्मयता के द्वारा ही सेनापति युद्ध का ठीक परिचालन कर पाते हैं। ठीक उसी तरह जीवन संग्राम में विजय प्राप्त करने के लिये मन की एकाग्रता व संकल्पशीलता आपेक्षित है।
एक ही बात जब तक मस्तिष्क में रहती है तब तक उसी के अनेक साधनों की सूझ होती रहती है। उनमें से उपयोगी बातों की पकड़ एकाग्रता से ही होती है।
एक ही दिशा में अपनी सारी चित्त-वृत्तियाँ आरोपित रखने से नये महत्व की बातों का ज्ञान तो होता ही है वह भूलें और त्रुटियाँ भी समझ में आ जाती हैं
यह मशीनों का युग है। अब मनुष्य का बहुत-सा काम कल-कारखाने पूरा करते हैं भारी उत्पादन के कारखानों के कल पुर्जे देखकर मस्तिष्क चक्कर काटने लगता है। इतनी सारी मशीनरी का नियन्त्रण कौन कर सकेगा। पर वह क्षमता इंजीनियर में होती
यदि आपको काम करते हुये बहुत समय बीत जाय और पूर्ण संलग्नता के बावजूद भी यदि कोई सफलता न मिले तो समझना चाहिए कोई जबर्दस्त कमी है।
पर यदि लक्ष्य स्थिर कर लिया जाय और जिस रास्ते में चल रहे हैं उसी में कुछ कमी दिखाई दे तो किसी दूसरे मार्ग से उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
इसमें सन्देह नहीं है कि मनुष्य के कठिन श्रम, एकाग्रता और सतत अभ्यास से बड़े-बड़े काम हल हो जाते हैं पर उद्देश्य जो निश्चित किये जावें, उनके औचित्य पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार कर लेना चाहिये।
पर जिन्हें हम पूरा कर सकने की स्थिति में हों और उनसे मनुष्य जीवन सार्थक होता हो तो ऐसे लक्ष्य-जीवन में बनाकर उन पर पूर्ण लगन, एकाग्रता व संलग्नता के साथ तब तक लगे रहना चाहिये जब तक सफलता न मिल जाय। एकाग्रता और संलग्नता में ही सफलता का सारा रहस्य छुपा हुआ है।
इच्छाशक्ति के बल से अपनी समस्त शक्तियों को केन्द्रित रखिए।
उस मन, मस्तिष्क या शक्ति से तुम क्या विजय की साधना करोगे, जो पल-पल इधर-उधर भागा-भागा फिरता है।
मन का वेग, भागना और चंचल होना, कम होते और उस विचार उच्च ध्येय में संलग्न होने से उन्मत्त इन्द्रियां चित्त को चलायमान न कर सकेंगी। मन की चंचलता जीतने के लिए इच्छा शक्ति का उपयोग कीजिए।
स्वामी विवेकानंद जी (Swami Vivekananda) के अनुसार- “एक विचार लो। उस विचार को अपना जीवन बना लो। उसके बारे में सोचो, उसके सपने देखो, उस विचार को जियो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के प्रत्येक हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो। यही सफल होने का तरीका है।”
0 टिप्पणियाँ