Summary:
मित्रों, मनुष्य Parishram द्वारा ही सुख-शांति देने वाली भौतिक ही नहीं आध्यात्मिक संपदाएं भी प्राप्त कर सकता है। जिसने जो कुछ पाया है अपने Parishram द्वारा ही पाया है। ईश्वर पूर्ण न्याय करने वाला है
जो जीवन को ऊँचा उठाना और अपने को आनंदित देखना चाहता है उसे Parishram से प्रेम करना चाहिए। परन्तु यह Parishram न तो केवल शारीरिक ही होकर रह जाय और न वह केवल मानसिक श्रम तक ही सीमित रहे बल्कि शारीरिक और बौद्धिक Parishram का हर बात में संमिश्रण किया जाय।
शरीर से जो श्रम किया जाय उसमें बुद्धि का संमिश्रण करके उसे इस प्रकार करना चाहिए कि सफाई, खूबसूरती एवं अच्छाई उसमें की झलक हो।
जो लोग यह कहते हैं कि जितना गुड़ डाला जाएगा उतना ही मीठा होगा, हमें कम पारिश्रमिक दिया जायगा तो कम या खराब काम करेंगे, यह तो अपनी ही तीन गुनी हानि हुई।
जो लोग दिमाग से मेहनत करते हैं और अपने बुद्धिबल से बहुत पैसा कमा लेते हैं उन्हें भी शारीरिक Parishram की उपेक्षा न करनी चाहिए, उसे तुच्छता एवं घृणा की दृष्टि से न देखना चाहिए।
मनोरंजन शारीरिक श्रम द्वारा-मस्तिष्क को सक्रिय रखने वाले नाड़ी तन्तुओं में सजीवता आती है, चैतन्यता उत्पन्न होती है।
मेहनत के कामों को हीनता या घृणा की दृष्टि से देखने की जो कुबुद्धि मनुष्य में उपज खड़ी हुई है, उस आसुरी अहंकार से उत्पन्न होने वाली अज्ञानता का भी नाश होता है। जो स्वास्थ्य लाभ की अपेक्षा भी अधिक उपयोगी है।
अमीरी के चोचले दिखाने के लिए जो श्रम दूसरों से लिया जाता है वह जीवन को उन्नत बनाने में अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा बाधक होता है। स्नान कराने के लिए नौकर चाहिए, कपड़ा पहनाने के लिए नौकर चाहिए, मुँह पर से मक्खी उड़ाने के लिए नौकर चाहिए, हाथ की छड़ी या थैला ले चलने के लिए नौकर चाहिए, इस प्रकार का नाजुकपन किसी कर्मठ व्यक्ति को शोभा नहीं देता।
कई व्यक्ति भूखों मरना, तंगी में रहना, बेकारी भुगतना पसंद करते हैं पर ऐसे कार्य करने को तैयार नहीं होते जो शारीरिक Parishram वाले होने के कारण ‘छोटे’ समझे जाते हैं। यह झिझक मिथ्या, अज्ञान-मूलक एवं हानिकारक है।
स्मरण रखिए Parishram ही सम्पूर्ण वैभवों का पिता है। जो जितना ही अधिक परिश्रमी होता वह उतना ही अधिक आनंदित रहेगा। परन्तु हमारे कार्यक्रम में शारीरिक और मानसिक Parishram का समान स्थान होना चाहिए, दोनों की महत्ता को समान रूप से समझना चाहिए।
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