जिद का प्रधान कारण बचपन में बालकों की उचित-अनुचित इच्छाओं की पूर्ति तथा अत्यधिक लाड़ प्यार है। बालकों को प्यार और सहानुभूति चाहिये, किन्तु इसकी अधिकता से बालक को एक प्रकार की मिथ्या आत्म-लघुता या बड़प्पन की भावना आ जाती है। वह अपने गुणों को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर देखता है। यह एक प्रकार का मद है, जिसके सामने माता-पिता का व्यक्तित्व झुक जाता है।
हर बार जिद कर वह माता-पिता के हृदय में करुणा का संचार करता है, माता-पिता की अति भावुकता के कारण वह अनुचित बातों, घृणित आदतों, असंयम, अनियमितता और आनन्द की ओर बढ़ता जाता है। प्रत्येक जिद उसके मानसिक जगत में रहने वाला मस्तिष्क का एक मानसिक मार्ग है। पुनरावृत्ति से इन मार्गों की गहराई निरन्तर बढ़ती रहती है। जिद्दी बालक बड़े होकर माता पिता के लिये एक विषम समस्या बन जाते हैं।
सुधारने का सर्वप्रथम उपाय यह है कि अपने मन से झूंठी भावुकता, जो बालक का भविष्य बिगाड़ रही है, निकाल देनी चाहिए। उसकी अनुचित बातों को पूर्ण कभी न करें चाहे वह दिन भर मचलता रहे। दो चार बार सख्ती दिखाने से बालक को यह मालूम हो जायगा कि वह रोकर या जिद से आपको नहीं हरा सकता है। अतः वह यह आदत छोड़ देगा।
रोने से चुप करने के लिए किसी प्रकार की मिठाई, पैसा, खिलौना अथवा अन्य किसी वस्तु के रूप में रिश्वत या घूंस देकर बालक को चुप मत कीजिए। उसे रोने चिल्लाने दीजिये और चिल्लाहट को सहन कर अपनी दृढ़ता दिखाइए।
उसे समय पर भोजन, दूध या जो कुछ फल इत्यादि आप देते हैं, देते रहिए। अनियमित रूप से उन्हें खिलौने या उनकी फरमाइशें पूरी करने से उनकी जिद तो चलती रहती ही है, स्वास्थ्य भी नष्ट हो जाता है। बालक को चाट पकौड़ी या बाजार की चीजें खिलाना सच्चा ममत्व नहीं है बाल्यावस्था से ही उन्हें संयम का पाठ पढ़ाना उचित है। नियमितता और संयम से उनका चरित्र निर्माण होता है।
वातावरण बदलने का भी उत्तम प्रभाव पड़ता है। जिन माता-पिता के पास वह अधिक जिद करता है, उनसे दूर रखकर नये व्यक्तियों में निवास करने से बालक को अपनी जिद की निस्सारता और पूर्ति न होने का तथ्य ज्ञान हो जाता है। अतः जिद्दी बालक दूसरों के घर में रह कर प्रायः सुधर जाते हैं।
बालक को जिद करते समय उसे पूर्ण कर अपनी कमजोरी न दिखाइये।
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