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आत्मोन्नति के मार्ग पर शीघ्र कौन पहुँच सकता है? ~ Who can reach the Path of Self-Promotion Soon?

 

आत्मोन्नति के मार्ग पर शीघ्र कौन पहुँच सकता है?

नमस्कार दोस्तों यदि तुम अपने पिछले जीवन का अधिकाँश भाग कुमार्ग में व्यतीत कर चुके हो या बहुत सा समय निरर्थक बिता चुके हो, तो इसके लिए केवल दुख मानने पछताने या निराश होने से कुछ नहीं होगा। जीवन का जो भाग शेष रहा है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

राजा परीक्षित का नाम तो आपने सुना ही होगा, राजा परीक्षित को मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह आत्म कल्याण करने के लिए मिला था, उन्होंने इस छोटे समय का सदुपयोग किया और अभीष्ट लाभ प्राप्त कर लिया।

मेरे भाई, वाल्मीकि के जीवन का एक बड़ा भाग, लूट, हत्या, डकैती आदि करने में व्यतीत हुआ था वे संभले तो वर्तमान जीवन में ही महान ऋषि हो गये। गणिका जीवन भर वेश्या वृत्ति करती रही, सदन कसाई, अजामिल, आदि ने कौन से दुष्कर्म नहीं किये थे।

मेरे भाई सूरदास को अपनी जन्म भर की व्यभिचारी आदतों से छुटकारा मिलते न देखकर अन्त में आंखें फोड़ लेनी पड़ी थी, तुलसीदास का कामातुर होकर रातों रात ससुराल पहुँचना और परनाले में लटका हुआ साँप पकड़ कर स्त्री के पास जा पहुँचना प्रसिद्ध है।

इस प्रकार के असंख्यों व्यक्ति अपने जीवन का अधिकाँश भाग बुरे कार्यों में व्यतीत करने के बाद भी सत्य के मार्ग पर आ गए और थोड़े से ही समय में योगी और महात्माओं को प्राप्त होने वाली सद्गति के अधिकारी बन गए |

मेरे भाई, यह एक रहस्यमय तथ्य है कि मंद बुद्धि, मूर्ख, डरपोक, कमजोर तबियत के ‘सीधे’ कहलाने वालों की अपेक्षा वे लोग अधिक जल्दी आत्मोन्नति कर सकते हैं जो अब तक सक्रिय, जागरुक, चैतन्य, पराक्रमी, पुरुषार्थी एवं बदमाश रहे हैं।

क्या आप जानते हो इसका कारण क्या है मेरे भाई | कारण यह है कि मंद चेतना वालों में शक्ति का स्त्रोत बहुत ही न्यून होता है वे पूरे रचनाकारी और भक्त रहें तो भी मंद शक्ति के कारण उनकी प्रगति अत्यंत मंदाग्नि से होती है। पर जो लोग शक्तिशाली हैं, जिनके अन्दर चैतन्यता और पराक्रम का निर्झर तूफानी गति से प्रवाहित होता है वे जब भी, जिस दिशा में भी लगेंगे उधर ही सफलता का ढेर लगा देंगे।

अब तक जिन्होंने बदमाशी में अपना झंडा बुलन्द रखा है वे निश्चय ही शक्ति सम्पन्न तो हैं पर उनकी शक्ति गलत कामों में लगी हुई है, यदि वही शक्ति सत्य के मार्ग पर लग जाय तो उस दिशा में भी आश्चर्य जनक सफलता उपस्थित कर सकती है।

मेरे भाई गधा दस वर्ष में जितना बोझा ढोता है, हाथी उतना बोझा एक दिन में ढो सकता है। आत्मोन्नति भी एक पुरुषार्थ है। इस मंजिल पर भी वे ही लोग शीघ्र पहुँच सकते हैं जो पुरुषार्थी हैं, जिनके स्नायुओं में बल और मन में अदम्य साहस तथा उत्साह है।

जो मंद मति, आलसी, दरिद्र, तम की स्थिति में हैं, उनकी क्रिया किसी भी दिशा में क्यों न हो। पुरुषार्थी, चतुर, संवेदनशील व्यक्ति रज की स्थिति में हैं चाहे वह अनुपयुक्त दिशा में ही क्यों न लगा हो। तम नीचे की सीढ़ी है, रज बीच की, और सत सबसे ऊपर की सीढ़ी है। जो रज की स्थिति में है उसके लिए सत में जा पहुँचना केवल एक ही कदम बढ़ाने की मंजिल है, जिस पर वह आसानी से पहुँच सकता है।



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