श्रम ही जीवन है
अकर्मण्यता मृत्यु है – उपनिषद से आधुनिक युग तक का शाश्वत सत्य
1. भूमिका – उपनिषद का गूढ़ रहस्य
दोस्तों,
उपनिषद में एक अद्भुत प्रार्थना मिलती है—
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः”
अर्थात –
कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा करो।
यहाँ यह नहीं कहा गया कि—
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आराम करते हुए जियो
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भोग करते हुए जियो
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मौज-मस्ती में सौ वर्ष जियो
बल्कि कहा गया—
काम करते हुए जियो।
क्यों?
क्योंकि ऋषि जानते थे कि—
श्रम के बिना जीवन का अधिकार भी टिकता नहीं।
श्रम के बिना सुख भी विष बन जाता है।
श्रम के बिना आनन्द भी बोझ बन जाता है।
2. श्रम के बिना जीवन की महानता सम्भव नहीं
जीवन की पूर्णता,
जीवन की गरिमा,
जीवन की समृद्धि—
तीनों का द्वार केवल एक ही कुंजी से खुलता है—
परिश्रम।
जो श्रम से दूर भागता है,
वह स्वयं जीवन से दूर भागता है।
3. स्वामी विवेकानन्द का वज्रवाक्य
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था—
“श्रम ही जीवन है।
जिस समाज में श्रम का सम्मान नहीं होता,
वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।”
अर्थात—
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जहाँ काम को छोटा समझा जाता है
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जहाँ आराम को आदर्श बनाया जाता है
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जहाँ श्रम से बचने को बुद्धिमानी माना जाता है
वहाँ पतन निश्चित है।
4. हेनरी फोर्ड की दृष्टि – काम ही जीवन देता है
अमेरिका के उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने लिखा—
“हमारा काम हमें केवल जीविका नहीं देता,
बल्कि स्वयं जीवन देता है।”
काम से—
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शरीर सक्रिय रहता है
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मन जाग्रत रहता है
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बुद्धि तेज होती है
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आत्मा प्रसन्न रहती है
काम के बिना मनुष्य जीवित तो रहता है,
पर जीवन्त नहीं रहता।
5. पण्डित नेहरू का अनुभव
पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा—
“काम का भार ही मेरे शरीर और मस्तिष्क की स्फूर्ति बनाए रखता है।”
काम मनुष्य को—
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जंग नहीं लगने देता
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सोच को ताज़ा रखता है
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आत्मविश्वास बढ़ाता है
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और भीतर की ऊर्जा को जगाए रखता है
6. श्रम – उन्नति का द्वार
हमारा काम ही—
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हमें आगे बढ़ाता है
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हमारे भीतर छिपी शक्तियों को जगाता है
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हमारे जीवन की संभावनाओं के द्वार खोलता है
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हमारे भविष्य को उज्ज्वल बनाता है
बार्टन ने कहा—
“श्रम एक चुम्बक है,
जो श्रेष्ठताओं को अपनी ओर खींच लेता है।”
7. श्रम और आनन्द का गहरा सम्बन्ध
डॉ. विश्वैश्वरैया कहते हैं—
“श्रम से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य मिलता है
और उससे सन्तोष तथा प्रसन्नता।”
अर्थात—
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श्रम = आनन्द
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अकर्मण्यता = दुःख
जो काम करता है वह थकता है,
पर प्रसन्न रहता है।
जो काम नहीं करता वह थकता नहीं,
पर भीतर से टूट जाता है।
8. अकर्मण्यता – रोगों की जननी
जो व्यक्ति निष्क्रिय रहता है,
उसके पास समय बोझ बन जाता है।
उस पर आक्रमण करते हैं—
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चिन्ता
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भय
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घबराहट
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कुढ़न
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अनिद्रा
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उच्च रक्तचाप
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हृदयरोग
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मोटापा
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चिड़चिड़ापन
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क्रोध
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निराशा
काम न करने से—
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शरीर सड़ने लगता है
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मन बिगड़ने लगता है
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आत्मा कुंठित हो जाती है
9. प्रकृति का नियम – गति ही जीवन
प्रकृति में देखो—
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सूर्य चलता है
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पृथ्वी घूमती है
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नदियाँ बहती हैं
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हवा चलती है
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रक्त प्रवाहित होता है
जो रुकता है,
वह सड़ता है।
जो गतिशील है,
वही जीवित है।
10. अकर्मण्य व्यक्ति – प्रकृति पर बोझ
जो अपने दिए हुए कार्य को नहीं करता,
वह प्रकृति के लिए अनुपयोगी हो जाता है।
और प्रकृति—
अनुपयोगी को अधिक दिन नहीं रखती।
इसलिए कहा गया है—
अकर्मण्यता मृत्यु का दूसरा नाम है।
11. काम न करना – जीवन का अपमान
काम न करना—
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प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है
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आत्मा के विकास के विरुद्ध है
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और जीवन के उद्देश्य के विरुद्ध है
यह विद्रोह है,
और हर विद्रोह की कीमत चुकानी पड़ती है।
12. सही जीवन का सूत्र
यदि सच में जीवित रहना है तो—
✔ कुछ न कुछ करते रहो
✔ उपयोगी बने रहो
✔ समाज के लिए मूल्यवान बनो
✔ अपने शरीर, मन और बुद्धि को गतिशील रखो
✔ श्रम को पूजा बनाओ
13. निष्कर्ष – श्रम ही अमृत है
दोस्तों,
याद रखिए—
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श्रम जीवन को सार्थक बनाता है
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श्रम आत्मा को उज्ज्वल बनाता है
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श्रम भविष्य को सुरक्षित बनाता है
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श्रम ही सच्चा आनन्द है
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श्रम ही सच्चा योग है
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श्रम ही सच्ची साधना है
और अकर्मण्यता—
धीरे-धीरे
मनुष्य को
चलती-फिरती लाश बना देती है।
इसलिए उपनिषद का वचन शिरोपरि रखिए—
कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की कामना करो।
क्योंकि कर्म ही जीवन है,
और अकर्म ही मृत्यु।
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