The Mind Sutra - MindCE

गायत्री मंत्र जपने के फायदे क्या होते हैं ~ Benefits of chanting Gayatri Mantra


गायत्री का जप करने से कितना महत्वपूर्ण लाभ होता है,

इसका कुछ आभास निम्न लिखित थोड़े से प्रमाणों से जाना जा सकता है। ब्राह्मण के लिए तो इसे विशेष रूप से आवश्यक कहा है क्योंकि ब्राह्मणत्व का सम्पूर्ण आधार सद्बुद्धि पर निर्भर है और वह सद्बुद्धि गायत्री में बताये हुए मार्ग पर चलने से मिलती है।
गायत्री समस्त वेदों का और गुह्य उपनिषदों का सार है। इसलिए गायत्री मन्त्र का नित्य जप करे। गायत्री मन्त्र का आराधन समस्त वेदों का सारभूत है। ब्रह्मादि देवता भी सन्ध्या काल में गायत्री का ध्यान करते हैं और जप करते हैं। गायत्री मात्र की उपासन करने वाला भी ब्राह्मण मोक्ष को प्राप्त होता है। गायत्री जपने वाले को साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुख प्राप्त हो जाते हैं। जो मनुष्य तीन वर्ष तक प्रति दिन गायत्री जपता है वह अवश्य ब्रह्म को प्राप्त करता है और वायु के समान स्वेच्छाचारी होता है। इस प्रकार मनु जी ने स्वयं कहा है कि अन्य देवताओं की उपासना करे या न करे, केवल गायत्री के जप से द्विज अक्षय मोक्ष को प्राप्त होता है। यहाँ पर अधिक कहने से क्या? अच्छी प्रकार उपासना की गई गायत्री द्विजों के मनोरथ पूर्ण करने वाली कही गई है। गायत्री के जान लेने से समस्त विद्याओं का वेत्ता हो जाता है और उसने गायत्री की ही उपासना नहीं की अपितु सात लोकों की भी उपासना कर ली। जो ब्रह्मचर्यपूर्वक ओंकार, महा व्याहृतियों सहित गायत्री मन्त्र का जप करता है वह श्रोत्रिय है। जो ब्राह्मण दोनों सन्ध्याओं में प्रणव व्याहृति पूर्वक गायत्री मन्त्र का जप करता है। वह वेदों के पढ़ने के फल को प्राप्त करता है। जो ब्राह्मण सदा सायं काल और प्रातः काल गायत्री का जप करता है वह ब्राह्मण अयोग्य प्रतिगृह लेने पर भी परमगति को प्राप्त होता है। श्रेष्ठ अक्षरों वाली गायत्री को विद्वान यदि एक बार भी जपे तो तत्क्षण सिद्धि होती है और वह ब्रह्म की सायुज्यता को प्राप्त करता है। ब्राह्मण अन्य कुछ करे या न करे, परन्तु वह केवल गायत्री जप से ही सिद्धि पा सकता है। अन्य अनुष्ठानादि करे या न करे, गायत्री मात्र की उपासना करने वाला द्विज कृतकृत्य हो जाता है। हे मुने! सन्ध्याकाल में सूर्य को अर्घ्यदान और तीन हजार नित्य जपने मात्र से पुरुष देवताओं से भी पूजनीय हो जाता है। गायत्री के एक अक्षर की सिद्धि मात्र से हरिशंकर ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि देवता भी साधक से स्पर्धा करने लगते हैं। दस हजार जपी गई गायत्री परम शोधन करने वाली है। सर्वोषाँचैव पापानाँ संकरे समुपस्थिते। दशसार्हासुकाम्यासे गायत्र्याः शोधनंपरम।। समस्त पापों को तथा संकटों को दस हजार गायत्री का जप नाश करके परम शुद्ध करने वाला है। जो गायत्री को सम्यक् जानकर उच्चारण करता है वह इस लोक में और परलोक में ब्रह्म की सायुज्यता प्राप्त करता है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ