शास्त्रों में तो गाय को मोक्ष और भगवद् प्राप्ति का दाता कहा गया है। गाय का घी यज्ञ के लिए सर्वोत्तम सामग्री है | ऋषियों का मानना है कि यज्ञ से बादल बनते और बारिश होती है जिससे अच्छा अन्न पैदा होता है और मानव-जीवन की सुख-सुविधायें बढ़ती हैं। गाय की उपयोगिता सर्वोच्च है कृषि का सम्पूर्ण भार उसी की पीठ पर है। एक ओर बछड़े देकर और दूसरी ओर स्वास्थ्य का साधन प्रस्तुत कर वह किसान का और इस तरह समाज और राष्ट्र का बड़ा कल्याण करती है। गाय के दूध में शक्ति और उष्णता होती है | जिससे शरीर में सात्विकता और तेजस्विता की व्रद्धि होती है | इस सम्बन्ध में भारतीय तत्ववेत्ता, महापुरुष, वैज्ञानिक और संसार के तमाम धर्म एकमत हैं। कहीं पर भी कोई विवाद या प्रतिवाद नहीं। सभी ने गाय के दूध को अमृत-तुल्य अर्थात अमृत के समान और परम पोषक पदार्थ माना है। अथर्व वेद अध्याय चार के २१ वें सूक्त के ६ मंत्र में लिखा है कि हे गौ माता! तुम्हारा अमृततुल्य दूध दुर्बल व्यक्तियों को बलवान बनाता है, कुरूप को सुन्दर और सुडौल बनाता है। तुम हमारे घरों को मंगलमय रखती हो। हम विद्वानों की सभा में तुम्हारा यशगान करते हैं। भारत के महान चिकित्सा शास्त्री एवं शल्य चिकित्सा आचार्य सुश्रुत ने कहा है कि गाय का दूध शौच साफ करने वाला, चिकना व शक्तिवर्द्धक और रसायन है। गाय का दूध रक्त तथा पित्त का शमन करता है। शीतल, स्वादिष्ट, आयुबर्द्धक और वात-पित्तहारी सर्व गुणकारी तथा मधुर फल देने वाला है। लोकमान्य तिलक का बड़ा भारी स्वप्न था—”स्वराज्य मिलते ही कलम की एक नोंक से एक मिनट में ही गौ-हत्या बन्द हो जायेगी।” सन्त विनोबा भावे का कहना है कि मैं मानता हूँ कि भारत की सभ्यता की यह माँग है कि हिंदुस्तान में गौरक्षा होनी ही चाहिए। अगर हम हिंदुस्तान में गौरक्षा नहीं कर सके, तो आजादी के कोई मानी ही नहीं होते। मैंने कहा है कि हिंदुस्तान में गौरक्षा होनी चाहिये। अगर गौरक्षा नहीं होती, तो कहना होगा कि हमने अपनी आजादी खोयी और उसकी सुगन्ध गंवायी। गाय और बैल दोनों मिलकर गौ कहा जाता है। दोनों में फर्क नहीं है। वेदों में गाय के लिए ‘अघ्न्या’ और बैल को ‘अघ्न्य’ कहा गया है। इस शब्द का मतलब है कि जिसको मारना नहीं। इस तरह यहाँ की सभ्यताएं गाय और बैल दोनों की रक्षा की जिम्मेवारी उठायी है इसके बाद भारतीय संविधान की 48 वीं धारा में भी गौवध निषेध का स्पष्ट उल्लेख है। पर यह दुःख और लज्जा की बात है कि स्वतन्त्र भारत में महात्मा गाँधी की वाणी, लोकमान्य के स्वप्न को पूरी तरह ठुकराया गया। थोड़ी-सी विदेशी पूँजी के लालच के कारण शासन सत्ता द्वारा इस भयानक कुकृत्य को रोका न गया। लार्ड मैकाले का यह कथन—” अंग्रेजी शिक्षा के द्वारा भारत में एक ऐसा वर्ग तैयार हो जायगा जिसका रंग हिन्दुस्तानी होगा पर दिल अँग्रेजी” के अनुसार आज लाखों पढ़े-लिखे हिन्दू लोग भी गौवध समर्थक नीति के वकील बन गये हैं। लगभग सारा देख आज गाय के महत्व को भूल चुका है। गाय के दूध में सात्विकता और तेजस्विता की मात्रा अधिक होने से उसका महत्व बहुत अधिक है। अपनी “भोजन” नामक पुस्तक में डाक्टर मकेरिसन ने लिखा है— “भोजन शुद्ध और शक्तिशाली तभी होता है जब उसमें तमाम खनिज पदार्थ हों, गाय के दूध के सिवाय ऐसा कोई भोजन नहीं जिसमें सभी पोषक तत्व ठीक अनुपात में हों।” “क्षीरात्परं नास्ति च जीवनम्” दूध से अच्छा और कोई जीवन बढ़ाने वाला पदार्थ नहीं। पर दूध मिलना तभी सम्भव है जब अधिक से-अधिक मात्रा में गायें पाली जाँय, उनके लिये चरागाहों का प्रबन्ध रखा जाये और गायों को वध से बचाया जाय। यह कार्य सरकार को तो करना ही चाहिए मुख्य उत्तरदायित्व तो जनता का है। हमारी सभ्यता और संस्कृति कृतघ्नता तथा नैतिकता प्रधान रही है। गाय उसका प्रमाण रही। हम गान्धी जी के कथन को आज भी नहीं भूलते—”गोरक्षा हिन्दू धर्म की दी हुई दुनिया के लिए बख्शीश है और हिन्दू धर्म भी तब तक रहेगा जब तक गाय की रक्षा करने वाले हिन्दू हैं।”
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